सोमवार, 22 नवंबर 2010

जागरण: नीति विशारद चाणक्य कहते हैं

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं

गूढ़मैथुनचरित्वं च काले काले संग्रहम्।
अप्रमत्तमविश्वासं पंच शिक्षेच्च वायसात्।।

हिंदी में भावार्थ-छिपकर मैथुन करना, ढीठपना दिखाना, नियत समय पर संग्रह करना तथा सदैव प्रमादरहित होकर जागरुक रहना तथा किसी पर विश्वास न करना-यह पांच गुण कौए से सीखना चाहिए।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे के बोलों की तर्ज पर आजकल लोग अपनी यौन क्रीड़ाओं की खुलेआम चर्चा कर गौरव की अनभूति करते हैं। अगर कानूनी बंदिश न हो तो शायद लोग सरेआम ही वह सारे कार्य करने लगें जिनको पर्दे के पीछे करना ही उचित है। कहा जाता है कि कौआ स्याना पक्षी है। किसी भी स्याने मनुष्य को कौआ कहकर संबोधित किया जाता है। एक तरह से कहा जाये कि लोग कौए को हिकारत की दृष्टि से देखते हैं जबकि उसी से सीखने लायक बहुत कुछ है। जिस ढीठपन को हम कौए का दुर्गुण समझते हैं वह उसका गुण है क्योंकि वह अपने चरित्र और खानपान पर दृढ़ रहता है। समय आने पर संचय भी करता है। उसे जाल में फंसाना मुश्किल माना जाता है।

इसके विपरीत हम अपने समाज को देखें कि पश्चिम द्वारा प्रदत्त प्रमाद और विलासिता के साधनों में अपना मन फंसा कर हम अपना स्वविवेक खो बैठे हैं। कौआ प्रमाद में न फंसकर हमेशा जागरुक रहता है जबकि हमारे देश में प्रमाद का इतना बोलाबाला है कि लगता ही नहीं कि लोग सतर्क और जागरुक हैं। अपराध इसलिये नहीं बढ़े कि प्रशासन सतर्क नहीं है बल्कि लोग जागते हुए भी सुप्तावस्था में रहते हैं। यही हाल स्त्रियों के प्रति बढ़े अपराधों का है। उनके खिलाफ बढ़ती हिंसा असावधानियों के कारण अधिक है। सच बात तो यह है कि हमारा समाज अपनी कर्मण्यता और सुप्तावस्था की वजह से ही भारी संकट में फंस गया है। हमारे अंदर प्रमाद और विलासिता की जो भावना है उसकी वजह से ही विदेशी बैंकों की जमा राशि बढ़ रही है। एक तरह से हम आर्थिक गुलाम बन गये हैं।

देश में कौवों की संख्या कम होती जा रही है। ऐसा लगता है कि उनकी कमी से हमारे देश में सतर्कता और जागरुकता के गुणों की कमी हुई है। वह शायद चलते फिरते और उड़ते हुए यहां अपने गुणों का विर्सजन करते थे। संभवतः कौओं को देखकर इंसान इसलिये ही हिकारत की दृष्टि से देखते हैं क्योंकि तब उनको अपनी विलासिता और मानसिक कमजोरी का अहसास होता है। उनको लगता है कि जैसे वह उनको मीठी नींद से जगा रहा है। हां, यह भी सच है कि आदमी को सोना ही अच्छा लगता है चाहे वह शारीरिक रूप से हो या मानसिक रूप से। 

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

वैदिक संस्कृति के संरक्षक वेद व्यास

परोपकार को सबसे बड़ा पुण्य कार्य मानने वाले भगवान् वेद व्यास स्वयं देशवासियों का ऐसा उपकार कर गए जो अनंत काल तक उनकी स्मृति को अक्षुण रखेगा | जब महाभारत काल में वेदों के लुप्त होने का संकट पैदा हो गया, तब भगवान् वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया ताकि वैदिक ज्ञान-विज्ञान की सुरक्षा हो सके |


महर्षि वशिष्ठ के प्रपौत्र, महामुनि शक्ति के पौत्र और आचार्य श्रेष्ठ पाराशर के पुत्र तथा महायोगी शुकदेव जी के पिता श्री भगवान् व्यास देव माता सत्यवती के गर्भ से प्रकट हुए थे | उन्हें अनेक नामों से संबोधित किया जाता है | उनका जन्म एक द्वीप में गा था | अतः वह द्वैपायन कहलाए | उनका रंग सांवला (श्यामल) था, अतः वह कृष्ण कहलाये | व्यास जी ने भगवान् नरनारायण की तपोभूमि बदरी (बेर) वन के शम्याप्रास नामक स्थल में अपना आश्रम बनाकर साधना की | अतः वह बादरायण कहलाए | सत्यवती की संतान होने के कारण वह सत्यवती नंदन कहलाए | ऋषि पाराशर का पुत्र होने के कारण वह पाराशर कहलाए | उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध नाम है वेदव्यास |


आरम्भ में चारों वेद एक ही संहिता में समाहित थे | यज्ञ की सुविधाजनक सम्पूर्ति/सम्पादन के लिए व्यास जी ने वेदों की संहिता को चार भागों में विभाजित किया | उन्होंने चारों वेदों के अलग-अलग ऋत्विक (पुरोहित) निर्धारित किये, जिनके नाम हैं अध्वर्यु, होता, उदगाता और ब्रह्मा | व्यास देव जी ने उनके उपयोग के लिए मन्त्रों का पृथक-पृथक वर्गीकरण किया | वस्तुतः 'व्यास' शब्द का एक अर्थ विश्लेषण, विभाजन और विस्तार भी होता है | अतः वेदों का व्यास करने के कारण ही पाराशर पुत्र वेद व्यास कहलाए | 


तत्पश्चात व्यास जी ने विश्व प्रसिद्ध महाभारत  की रचना की | अठारह पर्वों में विभाजित द्वितीय महाकाव्य 'पंचम वेद' के नाम से भी प्रसिद्ध है, क्योंकि महाभारत ज्ञान का विश्वकोश है | इसके विषय में महर्षि ने स्वयं कहा है जो कुछ महाभारत में है, वह विश्व में है, जो इसमें नहीं है, वह विश्व में कहीं नहीं है | इस प्रकार सम्पूर्ण वेद (ज्ञान) का सार महाभारत में विद्यमान है | भगवान् व्यास जी बोलते जाते और गणेश जी उसे लिपिबद्ध करते जाते थे | इस प्रकार महाभारत अस्तित्व में आया |


सर्वसाधारण की सुविधा के लिए व्यास जी ने श्रीमद्भागवत की भी रचना की | यह भक्तियोग का सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है | लोक कल्याणकारी साहित्य की विपुल रचना करने के कारण ही महर्षि वेदव्यास को भगवान् की अति सम्मानपूर्ण संज्ञा से विभूषित किया गया है | उनके सभी ग्रंथों का सार श्रीमद्भागवतगीता में निहीत है, जो विश्व साहित्य और दर्शन की अमर निधि है | उल्लेखनीय है की गीता महाभारत का ही एक अंश है |


धार्मिक ओ साहित्यिक ग्रंथों के अतिरिक्त महर्षि व्यास ने आचरण सम्बन्धी ग्रंथों का भी प्रणयन किया | 'व्यास-स्मृति' का संस्कृत-वांग्मय में विशिष्ट स्थान है | उन्होंने इसमें सोलह संस्कारों का वर्णन और उनकी संक्षिप्त विधि का निरूपण किया है | दृष्टव्य है की उन षोडश संस्कारों पर ही भारतीय संस्कृति और शिक्षा का स्वरुप वस्तुतः सम्पूर्ण जीवन का ढाँचा ही, आधारित है |


वैदिक वांग्मय के संरक्षण और प्रचार-प्रसार हेतु भगवान् वेदव्यास ने अपने शिष्य पैल को ऋग्वेद, जैमिनी को सामवेद, वैशम्पायन को यजुर्वेद और सुमंत को अथर्ववेद के लिए नियुक्त किया | गीता, जो महाभारत का नवनीत है, के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अपने शिष्य लोमहर्षण को नियुक्त किया |


महाभारत युद्ध के पश्चात भगवान् वेदव्यास स्व-शिष्यों सहित काशी आये तब समस्त विद्वज्जनों ने उनकी पूजा-अभ्यर्थना की | उस दिन आषाढ़ मास की पूर्णिमा थी | तभी से आषाढी पूर्णिमा को व्यास पूजा या गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाने की परम्परा चली आ रही है | व्यास जी लोगों को पुराण सुनाया करते थे | उसी समय से व्यास पीठ या व्यास गद्दी की परम्परा भी प्रचलित है | इस प्रकार हिन्दू संस्कृति का वर्तमान स्वरुप भगवान् वेदव्यास द्वारा सजाया व संवारा गया है | हमारी सनातन संस्कृति व्यास जी द्वारा रचित ब्रह्म-सूत्र महाभारत (गीता) और पुराणों तथा श्रीमद्भागवत का ही अवलंबित है |


- साभार श्री पाथेय

रविवार, 13 जून 2010

चाणक्य नीति

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं
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आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।

हिन्दी में भावार्थ कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।  कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच, भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है। धर्म परिवर्तन करने वाले कभी सुखी नहीं रहते है और आस्था बदलने वालों का भटकाव कभी ख़त्म नहीं होता यह  अंतिम सत्य है।

रविवार, 25 अप्रैल 2010

वनवासी हिन्दू समाज के अभिन्न अंग हैं |

"शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था

जिन्हें गिरिजन, वनवासी कहते हैं, हम उनके पास जाते नहीं| यदि अपनी रक्षा करने का प्रसंग आता है तो हम उनके पास जाकर कहते हैं कि तुम बड़े बहादुर हो, अपनी सेना में भर्ती हो जाओ | अब केवल उनका उपयोग इसी के लिए करना, परन्तु उनके साथ मनुष्यता का व्यवहार नहीं करना क्या उचित है ? इसके लिए अपवाद है महाराणा प्रताप का | महाराणा प्रताप ने उनके साथ बंधुत्व का नाता जोड़ा था, परन्तु बाद में इसका ध्यान नहीं रखा गया | सब लोगों ने अंपने स्वार्थ के लिए उनका उपयोग किया | यह बड़ी चिंता कि बात है | उनको धर्म का बोध नहीं है, कर्म का ज्ञान नहीं है, इसमें अपराध किसका है ? वह अपराध हमारा है |

असम मैं जो फिरिवासी रहते हैं, वे गो-मांस खाते है, तो शरीर आर रोंगटे खड़े हो जाते हैं | कोई कहेगा कि वे कितना भयंकर पाप करते हैं | मुझे एक बड़े साधुपुरुष ने यही कहा - 'वे लोग गोमांस क्यों खाते हैं ? क्या वे शौक से खाते हैं ? उनको दूसरा कुछ खाने को मिलता नहीं, उनको खाना मिले इसके लिए हम लोगों ने कुछ किया नहीं, कोई शिक्षा दी नहीं, कोई उद्योग दिए नहीं | आज ही क्यों, पिछली कुछ शताब्दियों से हमने इस कर्तव्य का पालन नहीं किया |'

वे लोग गोमांस खाते हैं, वह उनका पाप नहीं, हमारा पाप है | उस पाप के भागीदार हम हैं | अनुकूलता होते हुए भी हम उनको शिक्षा-दीक्षा देने के लिए गए ही नहीं | उन्हें समाज के अच्छे घटक बनाने के लिए किसी ने प्रयत्न किया नहीं | क्या किसी उनको बताया हैं कि यह गौ वन्दनीय है ? क्या किसी ने उनको बताया है कि वे हिन्दू हैं ? क्या उनके अन्तःकरण में यह प्रेरणा जगाई ?

दंड के भागीदार तो हम हैं | हम इस दंड को स्वीकार करें और निश्चय करें कि अब हम हिजी स्वार्थ को मर्यादित रखकर अपने पाद कि बुद्धि और धन इन सब लोगो को सुशिक्षित-सुसंस्कारित करने के लिए खर्च करेंगे, अन्यथा विदेशी ताकतें इन सब पहाड़ी वंशों का गलत उपयोग कर वहाँ अपने प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न करेंगी | हमसे उन्हें अलग तोड़कर इस राष्ट्र जीवन को संकट में डालने का उनका षड्यंत्र चल ही रहा है |"

- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के ये विचार आज के सन्दर्भ में कितने प्रासंगिक लगते हैं | क्योंकि हम देख रहे हैं कि आज यदि हमने या हमारी सरकार ने नक्सलवाद को घृणित दृष्टि से देखते हुए वनवासियों और दलित वर्गों के उत्थान के प्रयत्न नहीं किये तो आने वाला समय हम सबके लिए कितना भयानक होगा इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते | तो बंधुओं सामाजिक समरसता का भाव मन में जगाकर हम अपने सामर्थ्यानुसार अपने आस-पास के रहने वाले वनवासि वर्ग के लोगों, दलितों और परित्यक्तों सुशिक्षित-सुसंकारित बनाने का प्रयास करें यही अपने स्वधर्म, समाज, संस्कृति और राष्ट्र को बचाने का एक मात्र मार्ग है |


"माँ भारती हम सबका मार्ग प्रशस्त करे"

वन्दे मातरम जय भारत जय संस्कृति

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

शाम ढली

शाम आज फिर ढल गई,
हर रोज़ उगती ज़िन्दगी
फिर यूं ही निकल गई ...........
शाम आज फिर ढल गई,

दिन में उगता सूरज आए
आस जगे और मन हर्षाए
समयधार
भी रेत की भाँति
फिर हाथों से फिसल गई ..........
शाम आज फिर ढल गई,

क्या यूं ही जीवन चला चले ?
हर रोज़ उगे, हर रोज़ ढले
अपनी जीवन गाथा कैसे,
कथानकों में बदल गई ............
शाम आज फिर ढल गई,

रात को सोना दिन में जगाना,
खाना-पीना काम में लगाना,
"ये तेरा, ये मेरा" इसी में,
उमर सारी गल गई ...........
शाम आज फिर ढल गई,

आज में रोऊँ कल का रोना
"नहीं कमाया तो क्या होगा"
एक बार फिर कल चिंता
आज को मेरे निगल गई ............
शाम आज फिर ढल गई,

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

बढ़ता चल

यह कल-कल छल-छल बहता जल,
है सिखा रहा तू बढ़ता चल |

उत्तुंग शिखर हों सम्मुख तेरे,
छाये हों घनघोर अँधेरे |
कोई पथ में साथ नहीं हो,
किसी तरह की आस नहीं हो
फिर भी बढ़ता चल अविचल ...........
यह कल-कल छल-छल बहता जल

अपने भावी जीवन का,
निर्माण हमें ही करना है |
अपनी संस्कृति के हित में,
नव भारत को रचना है ||
बढ़ कर थामें परित्यक्तों को,
जिससे वे भी बनें सबल |
........... यह कल-कल छल-छल बहता जल

जीवन में अनगिन बाधाएँ,
अगर झेलनी पड़ जाए |
फिर भी डटकर खड़ा रहे,
और स्वधर्म को जो अपनाए ||
उसके सम्मुख स्वयं काल भी,
डरकर हो जाए निर्बल ||
........... यह कल-कल छल-छल बहता जल

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

चिंतन करते चलो, बंधुओं चिंतन करते चलो
रक्त कणों से मातृभूमि का सिंचन करते चलो .....
बंधुओं चिंतन करते चलो

वर्तमान के परिवेश में, स्थितियाँ गंभीर हैं
अरि हस्तों से खींच रहा, अब मातृभूमि का चीर है
जन्मभूमि रक्षार्थ तन, मन अर्पण करते चलो
..... बंधुओं चिंतन करते चलो

रक्त हो गया नीर हमारा, भूल गए हम कौन हैं
माँ की पीर बड़ी गंभीर है, फिर भी हम सब मौन हैं
समय गया अरि दल अब, तर्पण करते चलो
..... बंधुओं चिंतन करते चलो

देश, समाज, धर्म की सोचें, इसी में तो अस्तित्व है
चिंतन करें कि अपना-अपना बनता क्या दायित्व है
पावन माती पूजो शत-शत वंदन करते चलो
..... बंधुओं चिंतन करते चलो

'संघे शक्ति कलौ युगे', यह गीता ने बतलाया है
जीवन होम दिया पुरखों ने, सत्य कर दिखलाया है
संघ शरण में राष्ट्रहित, संगठन करते चलो
..... बंधुओं चिंतन करते चलो


शनिवार, 27 मार्च 2010

हमारे राष्ट्र निर्माता १. "आर्यभट्ट" भाग- १

आर्यभट्ट का जन्म विक्रमसंवत ५३३ सन ४७६ में हुआ था यह समय भारत का स्वर्णयुग था मगध शासक गुप्त साम्राज्य के निर्देशन में समूचा भारत बहुमुखी प्रगति की ओर अग्रसर था आर्यभट्ट का जन्म स्थान पटना अर्थात प्राचीन कालीन मगध की राजधानी पाटलिपुत्र के निकट स्थित कुसुमपुर नामक ग्राम है आर्यभट्ट सुप्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी थे खगोल विज्ञान पर भी उनका अच्छा अधिकार था

मंगलवार, 23 मार्च 2010

क्रान्ति अमर रहे

भगत सिंह के बलिदान को लेकर सैकड़ों गीत रचे और गाये गए आज भी, भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरु की वीर आत्माएं, इस देश के युवकों के हृदय में त्याग, बलिदान, आत्मोत्सर्ग आदि की ज्वलंत भावनाएं अबाध प्रवाहित कर रही हैं उनका साहस, बड़े-बड़े असाधारण काम करने की लगन और अटूट देशभक्ति- सभी के लिए प्रेरणादायी उदाहरण है|