शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

शाम ढली

शाम आज फिर ढल गई,
हर रोज़ उगती ज़िन्दगी
फिर यूं ही निकल गई ...........
शाम आज फिर ढल गई,

दिन में उगता सूरज आए
आस जगे और मन हर्षाए
समयधार
भी रेत की भाँति
फिर हाथों से फिसल गई ..........
शाम आज फिर ढल गई,

क्या यूं ही जीवन चला चले ?
हर रोज़ उगे, हर रोज़ ढले
अपनी जीवन गाथा कैसे,
कथानकों में बदल गई ............
शाम आज फिर ढल गई,

रात को सोना दिन में जगाना,
खाना-पीना काम में लगाना,
"ये तेरा, ये मेरा" इसी में,
उमर सारी गल गई ...........
शाम आज फिर ढल गई,

आज में रोऊँ कल का रोना
"नहीं कमाया तो क्या होगा"
एक बार फिर कल चिंता
आज को मेरे निगल गई ............
शाम आज फिर ढल गई,

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