गुरुवार, 29 जुलाई 2010

वैदिक संस्कृति के संरक्षक वेद व्यास

परोपकार को सबसे बड़ा पुण्य कार्य मानने वाले भगवान् वेद व्यास स्वयं देशवासियों का ऐसा उपकार कर गए जो अनंत काल तक उनकी स्मृति को अक्षुण रखेगा | जब महाभारत काल में वेदों के लुप्त होने का संकट पैदा हो गया, तब भगवान् वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया ताकि वैदिक ज्ञान-विज्ञान की सुरक्षा हो सके |


महर्षि वशिष्ठ के प्रपौत्र, महामुनि शक्ति के पौत्र और आचार्य श्रेष्ठ पाराशर के पुत्र तथा महायोगी शुकदेव जी के पिता श्री भगवान् व्यास देव माता सत्यवती के गर्भ से प्रकट हुए थे | उन्हें अनेक नामों से संबोधित किया जाता है | उनका जन्म एक द्वीप में गा था | अतः वह द्वैपायन कहलाए | उनका रंग सांवला (श्यामल) था, अतः वह कृष्ण कहलाये | व्यास जी ने भगवान् नरनारायण की तपोभूमि बदरी (बेर) वन के शम्याप्रास नामक स्थल में अपना आश्रम बनाकर साधना की | अतः वह बादरायण कहलाए | सत्यवती की संतान होने के कारण वह सत्यवती नंदन कहलाए | ऋषि पाराशर का पुत्र होने के कारण वह पाराशर कहलाए | उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध नाम है वेदव्यास |


आरम्भ में चारों वेद एक ही संहिता में समाहित थे | यज्ञ की सुविधाजनक सम्पूर्ति/सम्पादन के लिए व्यास जी ने वेदों की संहिता को चार भागों में विभाजित किया | उन्होंने चारों वेदों के अलग-अलग ऋत्विक (पुरोहित) निर्धारित किये, जिनके नाम हैं अध्वर्यु, होता, उदगाता और ब्रह्मा | व्यास देव जी ने उनके उपयोग के लिए मन्त्रों का पृथक-पृथक वर्गीकरण किया | वस्तुतः 'व्यास' शब्द का एक अर्थ विश्लेषण, विभाजन और विस्तार भी होता है | अतः वेदों का व्यास करने के कारण ही पाराशर पुत्र वेद व्यास कहलाए | 


तत्पश्चात व्यास जी ने विश्व प्रसिद्ध महाभारत  की रचना की | अठारह पर्वों में विभाजित द्वितीय महाकाव्य 'पंचम वेद' के नाम से भी प्रसिद्ध है, क्योंकि महाभारत ज्ञान का विश्वकोश है | इसके विषय में महर्षि ने स्वयं कहा है जो कुछ महाभारत में है, वह विश्व में है, जो इसमें नहीं है, वह विश्व में कहीं नहीं है | इस प्रकार सम्पूर्ण वेद (ज्ञान) का सार महाभारत में विद्यमान है | भगवान् व्यास जी बोलते जाते और गणेश जी उसे लिपिबद्ध करते जाते थे | इस प्रकार महाभारत अस्तित्व में आया |


सर्वसाधारण की सुविधा के लिए व्यास जी ने श्रीमद्भागवत की भी रचना की | यह भक्तियोग का सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है | लोक कल्याणकारी साहित्य की विपुल रचना करने के कारण ही महर्षि वेदव्यास को भगवान् की अति सम्मानपूर्ण संज्ञा से विभूषित किया गया है | उनके सभी ग्रंथों का सार श्रीमद्भागवतगीता में निहीत है, जो विश्व साहित्य और दर्शन की अमर निधि है | उल्लेखनीय है की गीता महाभारत का ही एक अंश है |


धार्मिक ओ साहित्यिक ग्रंथों के अतिरिक्त महर्षि व्यास ने आचरण सम्बन्धी ग्रंथों का भी प्रणयन किया | 'व्यास-स्मृति' का संस्कृत-वांग्मय में विशिष्ट स्थान है | उन्होंने इसमें सोलह संस्कारों का वर्णन और उनकी संक्षिप्त विधि का निरूपण किया है | दृष्टव्य है की उन षोडश संस्कारों पर ही भारतीय संस्कृति और शिक्षा का स्वरुप वस्तुतः सम्पूर्ण जीवन का ढाँचा ही, आधारित है |


वैदिक वांग्मय के संरक्षण और प्रचार-प्रसार हेतु भगवान् वेदव्यास ने अपने शिष्य पैल को ऋग्वेद, जैमिनी को सामवेद, वैशम्पायन को यजुर्वेद और सुमंत को अथर्ववेद के लिए नियुक्त किया | गीता, जो महाभारत का नवनीत है, के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अपने शिष्य लोमहर्षण को नियुक्त किया |


महाभारत युद्ध के पश्चात भगवान् वेदव्यास स्व-शिष्यों सहित काशी आये तब समस्त विद्वज्जनों ने उनकी पूजा-अभ्यर्थना की | उस दिन आषाढ़ मास की पूर्णिमा थी | तभी से आषाढी पूर्णिमा को व्यास पूजा या गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाने की परम्परा चली आ रही है | व्यास जी लोगों को पुराण सुनाया करते थे | उसी समय से व्यास पीठ या व्यास गद्दी की परम्परा भी प्रचलित है | इस प्रकार हिन्दू संस्कृति का वर्तमान स्वरुप भगवान् वेदव्यास द्वारा सजाया व संवारा गया है | हमारी सनातन संस्कृति व्यास जी द्वारा रचित ब्रह्म-सूत्र महाभारत (गीता) और पुराणों तथा श्रीमद्भागवत का ही अवलंबित है |


- साभार श्री पाथेय

1 टिप्पणी: