शाम आज फिर ढल गई,
हर रोज़ उगती ज़िन्दगी
फिर यूं ही निकल गई ........... शाम आज फिर ढल गई,
दिन में उगता सूरज आए
आस जगे और मन हर्षाए
समयधार भी रेत की भाँति
फिर हाथों से फिसल गई .......... शाम आज फिर ढल गई,
क्या यूं ही जीवन चला चले ?
हर रोज़ उगे, हर रोज़ ढले
अपनी जीवन गाथा कैसे,
कथानकों में बदल गई ............ शाम आज फिर ढल गई,
रात को सोना दिन में जगाना,
खाना-पीना काम में लगाना,
"ये तेरा, ये मेरा" इसी में,
उमर सारी गल गई ........... शाम आज फिर ढल गई,
आज में रोऊँ कल का रोना
"नहीं कमाया तो क्या होगा"
एक बार फिर कल चिंता
आज को मेरे निगल गई ............ शाम आज फिर ढल गई,
शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010
गुरुवार, 22 अप्रैल 2010
बढ़ता चल
यह कल-कल छल-छल बहता जल,
है सिखा रहा तू बढ़ता चल |
उत्तुंग शिखर हों सम्मुख तेरे,
छाये हों घनघोर अँधेरे |
कोई पथ में साथ नहीं हो,
किसी तरह की आस नहीं हो
फिर भी बढ़ता चल अविचल ........... यह कल-कल छल-छल बहता जल
अपने भावी जीवन का,
निर्माण हमें ही करना है |
अपनी संस्कृति के हित में,
नव भारत को रचना है ||
बढ़ कर थामें परित्यक्तों को,
जिससे वे भी बनें सबल | ........... यह कल-कल छल-छल बहता जल
जीवन में अनगिन बाधाएँ,
अगर झेलनी पड़ जाए |
फिर भी डटकर खड़ा रहे,
और स्वधर्म को जो अपनाए ||
उसके सम्मुख स्वयं काल भी,
डरकर हो जाए निर्बल || ........... यह कल-कल छल-छल बहता जल
है सिखा रहा तू बढ़ता चल |
उत्तुंग शिखर हों सम्मुख तेरे,
छाये हों घनघोर अँधेरे |
कोई पथ में साथ नहीं हो,
किसी तरह की आस नहीं हो
फिर भी बढ़ता चल अविचल ........... यह कल-कल छल-छल बहता जल
अपने भावी जीवन का,
निर्माण हमें ही करना है |
अपनी संस्कृति के हित में,
नव भारत को रचना है ||
बढ़ कर थामें परित्यक्तों को,
जिससे वे भी बनें सबल | ........... यह कल-कल छल-छल बहता जल
जीवन में अनगिन बाधाएँ,
अगर झेलनी पड़ जाए |
फिर भी डटकर खड़ा रहे,
और स्वधर्म को जो अपनाए ||
उसके सम्मुख स्वयं काल भी,
डरकर हो जाए निर्बल || ........... यह कल-कल छल-छल बहता जल

सदस्यता लें
संदेश (Atom)