है सिखा रहा तू बढ़ता चल |
उत्तुंग शिखर हों सम्मुख तेरे,
छाये हों घनघोर अँधेरे |
कोई पथ में साथ नहीं हो,
किसी तरह की आस नहीं हो
फिर भी बढ़ता चल अविचल ........... यह कल-कल छल-छल बहता जल
अपने भावी जीवन का,
निर्माण हमें ही करना है |
अपनी संस्कृति के हित में,
नव भारत को रचना है ||
बढ़ कर थामें परित्यक्तों को,
जिससे वे भी बनें सबल | ........... यह कल-कल छल-छल बहता जल
जीवन में अनगिन बाधाएँ,
अगर झेलनी पड़ जाए |
फिर भी डटकर खड़ा रहे,
और स्वधर्म को जो अपनाए ||
उसके सम्मुख स्वयं काल भी,
डरकर हो जाए निर्बल || ........... यह कल-कल छल-छल बहता जल

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