रविवार, 25 अप्रैल 2010

वनवासी हिन्दू समाज के अभिन्न अंग हैं |

"शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था

जिन्हें गिरिजन, वनवासी कहते हैं, हम उनके पास जाते नहीं| यदि अपनी रक्षा करने का प्रसंग आता है तो हम उनके पास जाकर कहते हैं कि तुम बड़े बहादुर हो, अपनी सेना में भर्ती हो जाओ | अब केवल उनका उपयोग इसी के लिए करना, परन्तु उनके साथ मनुष्यता का व्यवहार नहीं करना क्या उचित है ? इसके लिए अपवाद है महाराणा प्रताप का | महाराणा प्रताप ने उनके साथ बंधुत्व का नाता जोड़ा था, परन्तु बाद में इसका ध्यान नहीं रखा गया | सब लोगों ने अंपने स्वार्थ के लिए उनका उपयोग किया | यह बड़ी चिंता कि बात है | उनको धर्म का बोध नहीं है, कर्म का ज्ञान नहीं है, इसमें अपराध किसका है ? वह अपराध हमारा है |

असम मैं जो फिरिवासी रहते हैं, वे गो-मांस खाते है, तो शरीर आर रोंगटे खड़े हो जाते हैं | कोई कहेगा कि वे कितना भयंकर पाप करते हैं | मुझे एक बड़े साधुपुरुष ने यही कहा - 'वे लोग गोमांस क्यों खाते हैं ? क्या वे शौक से खाते हैं ? उनको दूसरा कुछ खाने को मिलता नहीं, उनको खाना मिले इसके लिए हम लोगों ने कुछ किया नहीं, कोई शिक्षा दी नहीं, कोई उद्योग दिए नहीं | आज ही क्यों, पिछली कुछ शताब्दियों से हमने इस कर्तव्य का पालन नहीं किया |'

वे लोग गोमांस खाते हैं, वह उनका पाप नहीं, हमारा पाप है | उस पाप के भागीदार हम हैं | अनुकूलता होते हुए भी हम उनको शिक्षा-दीक्षा देने के लिए गए ही नहीं | उन्हें समाज के अच्छे घटक बनाने के लिए किसी ने प्रयत्न किया नहीं | क्या किसी उनको बताया हैं कि यह गौ वन्दनीय है ? क्या किसी ने उनको बताया है कि वे हिन्दू हैं ? क्या उनके अन्तःकरण में यह प्रेरणा जगाई ?

दंड के भागीदार तो हम हैं | हम इस दंड को स्वीकार करें और निश्चय करें कि अब हम हिजी स्वार्थ को मर्यादित रखकर अपने पाद कि बुद्धि और धन इन सब लोगो को सुशिक्षित-सुसंस्कारित करने के लिए खर्च करेंगे, अन्यथा विदेशी ताकतें इन सब पहाड़ी वंशों का गलत उपयोग कर वहाँ अपने प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न करेंगी | हमसे उन्हें अलग तोड़कर इस राष्ट्र जीवन को संकट में डालने का उनका षड्यंत्र चल ही रहा है |"

- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के ये विचार आज के सन्दर्भ में कितने प्रासंगिक लगते हैं | क्योंकि हम देख रहे हैं कि आज यदि हमने या हमारी सरकार ने नक्सलवाद को घृणित दृष्टि से देखते हुए वनवासियों और दलित वर्गों के उत्थान के प्रयत्न नहीं किये तो आने वाला समय हम सबके लिए कितना भयानक होगा इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते | तो बंधुओं सामाजिक समरसता का भाव मन में जगाकर हम अपने सामर्थ्यानुसार अपने आस-पास के रहने वाले वनवासि वर्ग के लोगों, दलितों और परित्यक्तों सुशिक्षित-सुसंकारित बनाने का प्रयास करें यही अपने स्वधर्म, समाज, संस्कृति और राष्ट्र को बचाने का एक मात्र मार्ग है |


"माँ भारती हम सबका मार्ग प्रशस्त करे"

वन्दे मातरम जय भारत जय संस्कृति